May 9, 2021

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महाशिवरात्रि विशेष: “संकट में शंकर”, राजनीति से क्यों भयभीत हो गए भगवान भोलेनाथ??

व्यास मुनि द्विवेदी, रायपुर, 21 फरवरी 2020. आज महाशिवरात्रि का बहुत ही पावन दिन है. अधिकतर लोग धार्मिक हैं मंदिर जा रहे हैं. मंदिरों में बढ़ती भीड़ यह बताती है आज भी धार्मिक आस्था लोगों में बनी हुई है. यह बनी रहनी चाहिए क्योंकि धर्म और आस्था ही ऐसी चीज है जो आपको संबल देती है. बुरे वक्त में आपको खड़े रहने की हिम्मत देती है.

फेसबुक व् व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया में भी महाशिवरात्रि की बधाइयां लगातार दिख रही हैं. लगभग 90% लोगों के व्हाट्सप्प स्टेटस में आज भोजे बाबा की फोटो और भजन लगा हुआ है. यह देखकर ये प्रसन्ना हुई कि आज का युवा भी धार्मिक आस्था रखता है. एक राजनीतिक मित्र ने इन सब का अध्ययन करने के बाद मुझसे एक सलाह माँगा। कहा मित्र एक बात बताओ भगवान श्री राम और बजरंगबली के बाद क्या शिव भगवान राजनीतिक नैईया पार लगा सकते हैं? ऐसा आपको नहीं लग रहा है कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम के फॉलोवर्ष बहुत हैं जिसे किसी राजनीतिक पार्टी ने बहुत सदुपयोग किया और प्रभु श्रीराम के आशीर्वाद से पार्टी कहा से कहा पहुंच गयी. हालाँकि इसमें गौमाता का भी आशीर्वाद बराबर बना रहा, गौमाता का भी राजनीतिक दोहन भरपूर हुआ है.

आगे उन्होंने कहा हाल ही में एक दूसरी पार्टी ने भी प्रभु श्रीराम के भक्त “हनुमान” के चरण में पहुंची और जैसा कि हनुमान चालीसा में लिखा है “संकट ते हनुमान छुड़ावें भूत पिशाच निकट नहीं आवें” वैसा ही फल उनके भक्त को मिला। यह बात सही है हनुमान जी संकटमोचक हैं और उन्होंने संकट में राजनीतिक पार्टियों का भी सहयोग करते हैं. भगवन भक्त के वश में होते हैं.

आगे मित्र ने कहा आज मुझे ऐसा लग रहा है कि भोले बाबा के चाहने वाले बहुत हैं, और भोले तो भोले हैं किसी का बुरा नहीं करते यहाँ तक कि रावण भी उन्ही के आशीर्वाद से इतना शक्तिशाली बना था. भोले बाबा का अगर स्थान देखे तो सर्वोपरि है. स्वयं प्रभु श्रीराम के आराध्य हैं. लंका में चढ़ाई करने से पहले विजय हेतु प्रभु श्रीराम ने भी शिव पूजा की थी. दूसरी तरफ बजरंगवली स्वयं भगवान शिवजी के ११वें रुद्रावतार, सबसे बलवान और बुद्धिमान माने जाते हैं. तो क्यों ना हम अपनी पार्टी का प्रतीक भोले बाबा को बनाएं और भोले बाबा को अपनी पार्टी का पेटेंट बनवा दें. विचार मन में यह भी आ रहा है कि कैलाश गुफा ही क्यों वहां तो बहुत बड़ा मंदिर होना चाहिए।

हमारे मित्र ने यह भी बताया कि बजरंगबली महिलाओं से दूर रहते हैं अधिकतर पुरुषों के भगवान माने जाते हैं. लेकिन भोले बाबा का अगर आशीर्वाद पार्टी को मिल जाए तो महिला वोटर जो 50% है, हमारी तरफ आ सकती हैं. क्योंकि महिलाएं अच्छा पति पाने के लिए शिव भगवान की आराधना करती हैं. सोलह सोमवार का व्रत रखती हैं. इसलिए वह शिव भगवान की पार्टी को जरूर वोट करेंगे आपका क्या विचार है?

मैंने बड़ी विनम्रता से अपने मित्र को जवाब दिया की अब “शंकर भी संकट में” आ ही गए लगता है. अभी तक मर्यादा पुरुषोत्तम राम और उनके भक्त बजरंगबली राजनीति में उद्धार कर रहे थे. अब क्या आप शंकर भगवान की जटा से बहती धारा से राजनीतिक धारा निकालेंगे? अरे कम से कम भोले बाबा जो कि भोले हैं, उनको तो शांति से कैलाश पर्वत में रहने दो. क्यों इस राजनीतिक पचड़े में उनको फंसा रहे हो.

परम मित्र के मन के विचार के बाद मैंने सोचा कि बात सही है शिव भगवान के भक्त बहुत हैं और अगर किसी राजनीतिक पार्टी ने एकाधिकार कर लिया तो यह बहुत कठिन हो जाएगा और शंकर भगवान स्वयं संकट में आ जाएंगे कि किस भक्त का उद्धार करें और किसका तिरस्कार करें। समझ में नहीं आ रहा है कि ऐसी परिस्थिति में “संकट भोले बाबा के सामने खड़ा होगा या भोले बाबा स्वयं संकट में खड़े होंगे?”
जय महादेव!! महाशिवरात्रि की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं

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