April 16, 2021

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वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के मिशन में लघु धान्य फसलें महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी

रायपुर (सुयश ग्राम): लघु धान्य फसलों पर अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना की 29वीं दो दिवसीय वार्षिक समूह बैठक का शुभारंभ इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय परिसर में कृषि महाविद्यालय रायपुर के सभागार में हुआ। बैठक का शुभारंभ करते हुए अपर मुख्य सचिव एवं कृषि उत्पादन आयुक्त श्री सुनील कुमार कुजूर ने कहा कि छत्तीसगढ़ में लघु धान्य फसलों के उत्पादन की व्यापक संभावनाएं हैं। यहां परंपरागत रूप से लघु धान्य फसलों का उत्पादन होता रहा है जिसे और बढ़ावा दिये जाने की जरूरत है। उन्होंने लघु धान्य फसलों की उपयोगिता एवं महत्व को देखते हुए इन फसलों की अधिक उत्पादन देने वाली किस्में विकसित करने पर जोर दिया। श्री कुजूर ने कहा कि वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के मिशन में लघु धान्य फसलें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस समूह बैठक के सार्थक परिणाम सामने आएंगें।
समारोह की अध्यक्षता करते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के उप महानिदेशक (खाद्य एवं वन्य फसलें) डाॅ. आई.एस. सोलंकी ने कहा कि लघु धान्य फसलों के अंतर्गत प्रमुख रूप से रागी (फिंगर मिलेट), कोदो, कुटकी (लिटिल मिलेट), कंगनी (फाॅक्सटेल मिलेट), चीना (पोर्साे मिलेट) और सांवा (बार्नयार्ड मिलेट) आते हैं। भारत में इन फसलों का उत्पादन 18 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में होता है और कुल उत्पादन लगभग 22 लाख मीट्रिक टन होता है। उन्होंने बताया कि वर्ष 1951 के बाद से लघु धान्य फसलों का रकबा लगातार कम होता जा रहा है जिसका मुख्य कारण इनकी कम उत्पादकता है। उन्होंने कहा कि विगत कुछ वर्षाें में लघु धान्य फसलों के क्षेत्र में हुए अनुसंधान के द्वारा इन फसलों की अधिक उत्पादन देने वाली कई किस्में विकसित की गई है। डाॅ. सोलंकी ने कहा कि लघु धान्य फसलों को उगाने के लिए कम पानी, कम खाद और कम देख-रेख की आवश्यकता होती है। इसके साथ ही इनकी फसल अवधि भी कम होती है जिसकी वजह से इन्हें आसानी से उगाया जा सकता है। लघु धान्य फसलों में प्रोटीन, फायबर एवं मिनरल्स प्रचुर मात्रा में तथा वसा एवं शर्करा कम होने के कारण ये मोटापा तथा मधुमेह जैसे रोगों में काफी उपयोगी है। लघु धान्य फसलों के पौष्टिक एवं स्वास्थ्यप्रद होने के कारण अब इन फसलों की महानगरों में काफी अधिक मांग है और इसी वजह से अब इन्हें अमीरों का भोजन कहा जाने लगा है। उन्होंने बैठक में शामिल कृषि वैज्ञानिकों से आव्हान किया कि वे लघु धान्य फसलों की अधिक उत्पादन देने वाली किस्में विकसित करें ताकि किसान इनकी खेती के लिए प्रेरित हों।
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के संचालक अनुसंधान सेवाएं डाॅ. एस.एस. राव ने कहा कि छत्तीसगढ़ में लगभग 1 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में लघु धान्य फसलों की खेती होती है और लगभग 16 लाख मीट्रिक टन उत्पादन होता है। उन्होंने कहा कि इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के अंतर्गत शहीद गुंडाधूर कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, जगलपुर में लघु धान्य समन्वित अनुसंधान परियोजना का संचालन किया जा रहा है। विश्वविद्यालय द्वारा कोदो, कुटकी एवं रागी लघु धान्य फसलों की विपुल उत्पादन देने वाली 6 किस्में विकसित की गई हैं जिनमें इंदिरा कोदो-1 और छत्तीसगढ़ कोदो-2, छत्तीसगढ़ कुटकी-1 और छत्तीसगढ़ कुटकी-2 तथा इंदिरा रागी-1 और छत्तीसगढ़ रागी-2 शामिल हैं। छत्तीसगढ़ कुटकी-2 में लौह तत्व प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होने के कारण यह एनिमिया की रोकथाम में सहायक है। छत्तीसगढ़ रागी-2 किस्म की खेती खरीफ के साथ-साथ ग्रीष्म काल में भी की जा सकती है। कोदो की दोनों किस्में म्यूटेशन ब्रीडिंग के द्वारा विकसित की गई हैं। नेशनल ब्यूरो आॅफ प्लान्ट जेनेटिक रिसोर्सेज के सहयोग से यहां रागी की दो हजार से अधिक किस्मों के जननद्रव्य का संग्रहण एवं दस्तावेजीकरण किया गया है। विश्वविद्यालय द्वारा लघु धान्य फसलों का प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन करते हुए कोदो राईस, कुटकी राईस, रागी माल्ट, मल्टीग्रेन आटा आदि उत्पादों का निर्माण एवं विक्रय किया जा रहा है। इन फसलों से नये उत्पाद तैयार करने हेतु अनुसंधान कार्य भी जारी है। अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना (लघु धान्य फसल) के परियोजना समन्वयक डाॅ. प्रभाकर ने परियोजना के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि वर्ष 2017-18 के दौरान लघु धान्य फसलों की 21 नयी किस्में विकसित की गई हैं। इस अवसर पर परियोजना के तहत संचालित 16 मुख्य तथा 20 वैकल्पिक अनुसंधान केन्द्रों के प्रतिनिधियों द्वारा अपने-अपने केन्द्रों पर संचालित अनुसंधान कार्याें की जानकारी दी गई। इस अवसर पर लघु धान्य फसलों पर केन्द्रित विभिन्न प्रकाशनों का विमोचन भी किया गया। समारोह के दौरान बस्तर संभाग में लघु धान्य फसलों का उत्पादन एवं प्रसंस्करण करने वाले दो कृषक समूहों को सम्मानित भी किया गया। कृषि महाविद्यालय रायपुर के अधिष्ठाता डाॅ. ओ.पी. कश्यप ने अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में कृषि वैज्ञानिक तथा प्रगतिशील कृषक उपस्थित थे।

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