January 22, 2021

Suyashgram.com

मासिक पत्रिका एवं वेब न्यूज़ पोर्टल

संपादकीय: क्या है दिल्ली चुनाव में केजरीवाल की जीत और भाजपा की हार के मायने?… अब क्या होगा “आप” का राष्ट्रीय कदम?… प्रशांत किशोर बिहार में खिलाएंगे झाड़ू?

अरविन्द केजरीवाल और प्रशांत किशोर

व्यास मुनि द्विवेदी, रायपुर 12 फरवरी 2020, राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में हाल ही में हुए चुनावों ने पूरे देश में एक बड़ा मैसेज जरूर छोड़ा है. लोग माने या ना माने लेकिन इस बात में कोई दो राय नहीं है कि यह भाजपा के लिए भी एक संदेश है और राष्ट्रीय राजनीति के बदलते मायने के लिए भी यह एक दूरगामी परिणाम साबित होगा

दिल्ली के परिणाम
अगर दिल्ली के परिणामों का अध्ययन करें तो आम आदमी पार्टी को 53% से ज्यादा वोट मिले और भाजपा को 38% वोट मिले हैं. इसमें कोई दो राय नहीं कि भाजपा के लगभग 4% वोट बढे हैं. वही कांग्रेस के वोट प्रतिशत में जबरदस्त गिरावट आई है. लेकिन सीटों के मायने में कांग्रेस पिछली बार भी शून्य पर रही और इस बार भी शून्य पर ही है. यह बात भी सही है कि भाजपा की कुछ सीटें बढ़ी भी लेकिन वह ना के बराबर रही हैं. जिस तरह से दिल्ली की जनता ने एक तरफा वोटिंग किया है, उससे एक बात तो तय है कि सिर्फ धार्मिक एजेंडो के बल पर चुनाव हमेशा नहीं जीता जा सकता है. ऐसी कोई भी बात नहीं थी जिसमें भाजपा कम दिखाई दे रही हो धन की बात करें तो भाजपा के पास 3000 करोड़ से ज्यादा का फंड है जो पार्टी को चंदा के रूप में मिला है. भाजपा राष्ट्रीय पार्टी है भाजपा का तमाम बड़ा भारी संगठन है. खुद दिल्ली में भाजपा के पास एमसीडी की सरकार है. लायन आर्डर भी भाजपा के हाथ में ही है. सशक्त नेतृत्व है. फिर भी पतझड़ की तरह दिल्ली में पार्टी का झड़ जाना बड़ा संदेश है. संभव है इससे भाजपा को भी बड़ी सीख लेनी पड़ेगी। इस जीत में चुनाव मैनेजमेंट के गुरु माने जाने वाले प्रशांत किशोर का बड़ा हाथ है.

क्यों पीछे रह गई भाजपा?
अगर आपको याद हो तो जब नरेंद्र मोदी देश के राष्ट्रीय नेता के रूप में उभर रहे थे उस समय सबसे बड़ा मुद्दा गुजरात का विकास मॉडल था. उसके बाद हिंदुत्व था. कांग्रेस की 10 साल की सत्ता से जनता ऊब चुकी थी और उसे नया चेहरा चाहिए था उसी वक्त मोदी का उभार भाजपा के लिए वरदान बना. भाजपा दूसरे चरण में भी विकास के मुद्दे को अपने एजेंडे पर तो रखा लेकिन हिंदुत्व का एजेंडा ऊपर कर दिया, विकास पीछे छूट गया. भाजपा के रणनीतिकारों को यह लगने लगा कि विकास से ज्यादा महत्व हिंदुत्व का एजेंडा है. बस यही वजह थी कि भाजपा को जनता का मूड समझने में देरी हुई और दिल्ली हाथ में नहीं आई. दिल्ली चुनाव यह दर्शाता है कि लोगों के लिए धार्मिक मुद्दे से ज्यादा जरूरी रोटी, कपड़ा, और मकान आज भी मुद्दा बना हुआ है जिसको केजरीवाल ने पकड़ लिया है.

भाजपा के मार्केटिंग फीचर पर केजरीवाल का कब्जा
भाजपा का जिन मुद्दों के आधार पर राष्ट्रीय स्तर पर उभार हुआ था और प्रचंड बहुमत से केंद्र में सरकार बनी थी उन मुद्दों पर केजरीवाल ने हाथ मार दिया है. भाजपा के जितने भी मार्केटिंग के फीचर थे उस पर केजरीवाल ने एक-एक करके अपने कब्जे में ले लिया। भाजपा इस बात का अनुमान ही नहीं लगा पाई.

अगर हम बात करें तो केजरीवाल ने पहला मुद्दा डेवलपमेंट का पकड़ा। जो भाजपा गुजरात का विकास मॉडल दिखाती थी वहीं केजरीवाल ने आज दिल्ली का मॉडल दिखाना शुरू किया और भाजपा इस बात पर बहुत पीछे रह गई कि उसका विकास का मॉडल क्या है? उसने क्या किया है इस मुद्दे पर भाजपा अपना बचाव करते दिखाई दी सिर्फ धार्मिक मुद्दे पर ही अपना प्रचार करते रहे.

दूसरी तरफ केजरीवाल ने भाजपा के राष्ट्रीयता के मुद्दे पर भी हाथ मार दिया है केजरीवाल ने अपने एजेंडे में दिल्ली में राष्ट्रवाद पढ़ाने का मुद्दा शामिल करके यह बता दिया है कि केजरीवाल का भी मुद्दा राष्ट्रवाद ही है. इसका मतलब यह है कि केजरीवाल के इस मुद्दे का भी भाजपा विरोध नहीं कर पाएगी तो अगर देखें तो भाजपा को केजरीवाल ने पछाड़ दिया है. भाजपा के पास विकास में मुद्दे पर बात करने के लिए ज्यादा कुछ बचा नहीं है. अगर उनके नेताओं से आप बढ़ती महंगाई और घटती जीडीपी की बात करेंगे तो वह सिर्फ राष्ट्रीयता की बात करना चालू कर देते हैं. उस पर उनके पास कोई जवाब नहीं है बस यही एक बात है कि केजरीवाल ने नहले पर दहला मारा है और बीजेपी को बैकफुट पर लाकर खड़ा कर दिया है. इस रणनीति के पीछे भी प्रशांत किशोर का ही दिमाग माना जा रहा है.

केजरीवाल का अगला कदम क्या
दिल्ली में प्रचंड बहुमत मिलने के बाद सब यह देख रहे हैं कि आम आदमी पार्टी का अगला कदम क्या होगा? यह बात सही है कि आम आदमी पार्टी के पास राष्ट्रीय नेटवर्क न के बराबर है. अगर देखें तो दिल्ली के बाद सिर्फ पंजाब में ही आम आदमी पार्टी की उपस्थिति है. लेकिन अगर केंद्र की सरकार में केजरीवाल बैठना चाहते हैं तो अगला कदम उनका बिहार का चुनाव होगा। इस समय बिहार की राजनीति में बहुत बड़ा वैक्यूम बना हुआ है. राष्टीय जनता दल पूरी तरह से बिखरी पड़ी है. नीतीश और भी भाजपा दोनों ने मिलकर सरकार बना कर रखे हैं. इसका मतलब विपक्ष वहां पर ना के बराबर है. यह बात केजरीवाल और उनके सलाहकार साथी प्रशांत किशोर बहुत अच्छे से जानते हैं कि यह बहुत सही मौका है जब बिहार में हाथ मारा जा सकता है. बिहार के लिए उनके पास मुख्यमंत्री का चेहरा भी उपलब्ध है.

प्रशांत किशोर होंगे मुख्यमंत्री का चेहरा?
केजरीवाल को अगर दिल्ली के केंद्र की सत्ता में बैठना है तो उन्हें अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग चेहरे खोजना होगा। जिनके नाम पर स्थानीय लोग वोट दे सके. बिहार में इस समय आम आदमी के पार्टी के पास सबसे बढ़िया और सशक्त चेहरा प्रशांत किशोर हो सकते हैं. क्योंकि प्रशांत किशोर बिहार के सक्रिय राजनीति में भी रह चुके हैं और बिहार की राजनीति को बहुत अच्छे से समझते हैं. प्रशांत किशोर ने नीतीश कुमार की सरकार बनाने में बड़ा योगदान दिया है साथ ही नीतीश कुमार की पार्टी में वह राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी रहे हैं. हाल ही में विवाद के बाद उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया है. अगर आम आदमी पार्टी बिहार में जाती है और प्रशांत किशोर का चेहरा सामने लेकर आती है तो पार्टी जरूर उसे एक फायदा मिल सकता है प्रशांत किशोर चुनाव मैनेजमेंट में महारत हासिल कर चुके हैं. कई राज्यों की सरकार बना चुके हैं. जिनमें से पंजाब में कांग्रेस की सरकार बनाने में उनका हाथ था. वाईएसआर दक्षिण में हाल ही में विजय दिलाने में उनकी अहम भूमिका थी. नीतीश कुमार को भी विजय दिला चुके हैं इसके अलावा संभवत है ममता बनर्जी को भी वह चुनाव मैनेज करने में सहयोग करेंगे। यहाँ तक की नरेंद्र मोदी पहली बार प्रधानमंत्री बनाने में बड़ी रणनीतिक भूमिका रही है. आज प्रशांत किशोर के पास सब कुछ है, साफ़ सुथरा चेहरा हैं. और राजनीतिक पकड़ भी है. जिससे यह कयास लगाए जा रहे हैं कि आम आदमी पार्टी का अगला कदम बिहार होगा और प्रशांत किशोर मुख्यमंत्री के उम्मीदवार। इसके बाद बिहार और दिल्ली दोनों तरफ से बढ़ते हुए उत्तर प्रदेश में हाथ मारने की कोशिश की जाएगी और इसी के साथ केजरीवाल का राष्ट्रीय राजनीति में पदार्पण हो सकता है.

Spread the love

You may have missed