April 13, 2021

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संपादकीय: विकास के मुद्दे पर केंद्र में बनी भाजपा सरकार आज विकास के मुद्दे पर ही बात करने से क्यों कतरा रही है? दिल्ली की जनता तय करेगी देश के भविष्य की राजनीति दिशा !! दिल्ली चुनाव पर विशेष….

व्यास मुनि द्विवेदी, 4 जनवरी 2020. आपको याद होगा जब भाजपा सरकार केंद्र में 2014 में बनी उसके पहले पूरे देश में गुजरात विकास मॉडल की चर्चा कर रही थी. देशभर का मीडिया गुजरात जाकर उस विकास के मॉडल को देखना चाह रहा था हालाँकि आज तक देश उस विकास मॉडल को पूरी तरह से समझ नहीं पाया क्या विकास था? लेकिन केंद्र में उसी के बल बूते भाजपा की सरकार बन गयी.

देश में बड़ी विडंबना है कि राजनीतिक दल चुनाव के पहले किए गए वादों को भूल कर सारे काम करते हैं. और अंत में हर 5 वर्ष में नए मुद्दे खोजते हैं. क्योंकि पुराने मुद्दों पर वह कोई काम नहीं करते इसलिए नए मुद्दे खोजना मजबूरी हो जाती है. दिल्ली चुनाव भाजपा जैसी पार्टी को जो विकास के मुद्दे गुजरात के विकास मॉडल को लेकर तमाम देश भर में प्रचार करती थी, आज वह दिल्ली में विकास के मुद्दे पर बात ही नहीं करना चाह रही है आखिर ऐसा क्यों? आखिर भाजपा आज गुजरात के विकास के मॉडल और दिल्ली विकास मॉडल पर बात क्यों नहीं करना चाहती? तो क्या ये मान लिया जाये गुजरात का विकास मॉडल एक भ्रम था? अगर भाजपा गुजरात में इतना अच्छा विकास किया है तो दिल्ली के स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली, सड़क और पानी जैसे मुद्दे के साथ तुलना क्यों नहीं करना चाहती?

यह बात सच है कि दिल्ली में अरविंद केजरीवाल भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों पर भारी नजर आ रहे हैं. यहां तक कि केजरीवाल ने कांग्रेस की बात तो छोड़ दें भाजपा के लिए भी चुनाव में प्रचार करने के लिए कोई मुद्दा नहीं छोड़ा है. यह बात हो सकती है कि केजरीवाल ने जो भी पिछले चुनाव के दौरान वादा किए थे उसमें से कितने प्रतिशत पूरे किए या नहीं किया लेकिन देश के इतिहास में पहली बार वह अपने पुराने वादे और किए हुए काम पर वोट मांग रहे. बस यही बात है कि जो अन्य दल को असहज बना देती है. भाजपा ना तो अपने केंद्र में किए गए वादे पर बात कर पा रही है ना ही किसी अन्य भाजपा शासित राज्य की तुलना दिल्ली से कर पा रही है. यहाँ तक की भाजपा का मॉडल राज्य गुजरात भी बहस से गायब है. अगर भाजपा कहे गुजरात जैसे बिजली पानी दूंगा तो जनता एक वोट नहीं देगी, क्योंकि दिल्ली में दोनों फ्री हैं गुजरात में दोनों का संकट है.

दूसरी बात राज्य में उसके पास न कोई विजन है और ना ही कोई चेहरा है जिस पर वह वोट मांग सकें ऐसे में भाजपा के पास आखिर मुद्दा बचता क्या है? वही हिंदू और मुस्लिम यानी जाती-पाती क्षेत्रवाद जो राजनीति का पुराना खेल है. उसी पर भाजपा खेल खेलने के लिए मजबूर है.

प्रधानमंत्री खुद अपने भाषण में पूर्वोत्तर के लोगों के साथ अन्याय जैसे तमाम मुद्दे उठा रहे हैं लेकिन विकास पर या अपने 15 साल के मुख्यमंत्री कार्यकाल वाले गुजरात के विकास मॉडल पर बात करने से कतरा रहे हैं.

दूसरी तरफ भाजपा के फायर ब्रांड उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वही शाहीन बाग, आतंकवादी जैसे मुद्दों पर भिड़े हुए क्योंकि इनके पास यह कहने के लिए अब नहीं बचा है कि हम दिल्ली में उत्तर प्रदेश का मॉडल लाएंगे। जैसे ही योगी आदित्यनाथ कह दे कि हम दिल्ली में उत्तर प्रदेश जैसी शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था लागू करेंगे दिल्ली के लोग एक भी वोट नहीं देंगे। यही वजह है कि भाजपा जो विकास के मॉडल पर चिल्ला कर सरकार बनायीं थी आज उसी विकास की बात करने से उनके नेताओ को बुखार आ जाता है.

केजरीवाल ने भाजपा का जो यूनिक सेल्स फीचर था उसे छीन लिया है. यानी विकास का मुद्दा! भाजपा को उस जगह पर खड़ा कर दिया है जहां पर वह विकास का नाम ही नहीं लेना चाहती है. ऐसे में भाजपा के लिए यह स्थिति सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं रहेगी पूरे देश में बहस होगी कि आखिर भाजपा विकास के मुद्दे से शुरू हुई थी और सिर्फ धर्म और जाति के मुद्दे तक ही सिमटकर क्यों रह गई?

एक बात तो तय है कि दिल्ली के परिणाम देश की राजनीति को एक नई दिशा जरूर देंगे और हर दल इस बात के लिए मजबूर होगा की आपको जनता के लिए काम करना पड़ेगा भ्रष्टाचार को रोकना होगा. अपने किए हुए वादों पर बात करनी पड़ेगी। अरविंद केजरीवाल ने राजनीति की दिशा जरूर मोड़ दिए हैं. हालांकि यह पूरा प्रयास किया जा रहा है कि केजरीवाल की दिशा को मोड़ कर धर्म, जाति और क्षेत्रवाद पर लाया जाए. लेकिन यह होता नजर आ नहीं रहा है. यह चुनाव सिर्फ दिल्ली तक ही सीमित नहीं रहेगा इसके बाद यह बात पूरे देश में एक हवा जरूर देगी कि आखिर में जनता को चाहिए क्या? विकास या जाती, धर्म, दंगे जैसी राजनीती? लेकिन अब यह दिल्ली की जनता पर निर्भर करता है वह देश की राजनीती को किस दिशा में ले जाना चाहती हैं. जो दिल्ली चुनाव के परिणाम बताएँगे।

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