June 17, 2021

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वनमंत्री की अनुशंसा भी नहीं मानते विभाग के अधिकारी…बिना रेडियो कालर लगाए फिर छोड़ा तेंदुए को सीतानदी अभ्यारण में

रायपुर, 23 मई 2021, वन्यजीवों और वनों की रक्षा करने के अपने प्राथमिक कार्यों को दरकिनार कर दूसरे कार्यों में लगे वन विभाग के आला अधिकारी अब वन मंत्री की ही अनुशंसा को भी नहीं मानते. जानकार कहते है कि इसका कारण वन मंत्री का ट्रान्सफर पोस्टिंग के खेल से अपने को दूर रखना है.

दरअसल 2 वर्ष पूर्व वनमंत्री मो. अकबर की जानकारी में लाया गया था की राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ने वर्ष 2011 में गाइडलाइंस जारी की है कि जब भी किसी वन में तेंदुआ पकडाये तब उसे पुनः वन में छोड़े जाने से पहले तेंदुए पर अनिवार्य रूप से रेडियो कलर लगाया जावे ताकि उसके मूवमेंट की जानकारी रखी जा सके और उसके व्यवहार का अध्ययन किया जा सके. राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ने यह भी मार्गदर्शन दिया था कि तेंदुआ को उसी जंगल में छोड़ा जाए जहां से वह पकड़ा गया है क्योंकि तेंदुए की मूल प्रवृत्ति वापस अपने आवास क्षेत्र में लौटने की रहती है. दूर के जंगल में छोड़ने पर वह अवसाद में आ जाता है और पुनः अपने मूल आवास क्षेत्र की तरफ लौटने का प्रयत्न करता है, जिससे तेंदुआ और मानव द्वंद जैसी अन्य प्रकार की समस्याएं उत्पन्न होती है.

वन मंत्री की जानकारी में लाया गया कि 2011 की राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण की गाइडलाइंस के बाद भी तेंदुआ के लिए रेडियो कॉलर खरीदा ही नहीं गया.

वन मंत्री को यह भी सुझाव दिया गया कि प्रदेश में भालूओं को पकड़कर वापस वन क्षेत्रों में छोड़ने के बहुत प्रकरण होते हैं अतः भालूओं में भी रेडियो कॉलर लगाकर जंगल में छोड़ा जावे. वन मंत्री को सुझाव दिया गया था कि प्रभावित प्रत्येक वृत में आवश्यक संख्या में रेडियो कालर उपलब्ध करवाया जाये. सवेदनशील वन मंत्री की रेडियो कालर लगाने की अनुशंसा वन विभाग के मुख्यालय में जुलाई 2019 में पहुंच गई परन्तु आज तक रेडियो कालर नहीं ख़रीदे गए.

कल ही बिना रेडियो कालर लगाए छोड़ा है मादा तेंदुआ को….. सीता नदी अभ्यारण में

धमतरी वनमंडल की टीम ने कल ही एक मादा तेंदुआ को नगरी ब्लॉक से पिंजरे में पकड़कर सफलता पूर्वक सीतानदी अभ्यारण क्षेत्र में छोड़ा है. मुख्यालय द्वारा रेडियो कालर नहीं मुहैया कराने के कारण मजबूरी वश उसे बिना रेडियो कॉलर लगाएं छोड़ना पड़ा.

दो परिस्थितियों में छोड़ते हैं तेंदुआ और भालू को वापस जंगल में

कई बार तेंदुआ और भालू को चोटिल होने पर या कोई अन्य कारण से पकड़कर कुछ दिन रेस्क्यू सेंटर जैसे कि जू में रख के इलाज कराया जाता है और ठीक होने पर पुनः जंगल में छोड़ दिया जाता है. वर्ष 2017 से ऐसे लगभग 20 प्रकरण हो चुके हैं जिनमें तेंदुआ और भालू को वापस जंगल में छोड़ा गया है. दूसरी परिस्थिति में तेंदुआ और भालू का लगातार किसी गांव में आने से और अन्य परिस्थितियों में पकड़ कर फील्ड स्तर के अधिकारियों द्वारा निर्णय लेकर, बिना रेस्क्यू सेंटर लाए स्वस्थ जाँच करा कर, सीधे उचित क्षेत्र में छोड़ दिया जाता है.

वन विभाग की नीरसता के कारण नहीं बढ़ रही संख्या, क्या कहा वन्यजीव प्रेमियों ने?

रायपुर के वन्यजीव प्रेमी नितिन सिंघवी ने चर्चा में बताया कि वे पिछले पांच सालों से रेडियो कॉलर लगाने की मांग कर रहे हे कई बार अधिकारियों से भी मिल चुके है, कई पत्र लिख चुके है. अधिकारी मान. मंत्री जी की अनुशंसा भी नहीं मानते. गरियाबंद में तेंदुआ पकड़ते हैं और बिना उचित अध्ययन कराएं अचानकमार टाइगर रिजर्व में छोड़ देते हैं. अन्धाधुन अवैध शिकार और रेडियो कालर नहीं लगने से, मोनिटरिंग नहीं होने के कारण तेंदुए की संख्या नहीं बढ़ रही है. 2014 में छत्तीसगढ़ में 846 तेंदुए थे जो कि 4 साल में 0.75 प्रतिशत बढ़ कर 2018 में 852 हुए जबकि मध्य प्रदेश में 2014 में 1817 तेंदुए थे जो की 2018 में 88 प्रतिशत बढ़ कर 3421 हो गए. पूरे देश में इन 4 सालों में तेंदुआ का सफलतापूर्वक संरक्षण करके उनकी संख्या बढ़ा दी गई है परंतु छत्तीसगढ़ वन विभाग की नीरसता बरकरार है.

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