संपादकीय

संपादकीय: “वैसे तो दुनिया में सभी आते है मरने के लिए, पर असल मौत उसकी जिसका जमाना अफ़सोस करे…” जरा सोचिये आखिर इन 2 मौतों में क्या बात है जिसके कारण लोग दुख मना रहे हैं..

व्यास मुनि द्विवेदी, रायपुर 30 अप्रैल 2020: आज कोरोनावायरस के संक्रमण से देश ही नहीं दुनिया भर में मौतों का ताता लगा हुआ है. लाशें चारों तरफ बिछी हैं, रोज मरने की खबर आती है. लेकिन कभी किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की मरा कौन?

हम कोरोना से मौतों का आंकड़ा इसलिए देखते हैं कि हम डरे हुए हैँ. कहीं हम तो संक्रमित नहीं हो जाएंगे? हमारे आस पास तो कोई नहीं है? मरने वालों से हमारा कोई सरोकार नहीं होता इसलिए हमें दुख नहीं है. लेकिन हाल ही में बॉलीवुड से इरफान खान और ऋषि कपूर की मौतों ने सभी को झकझोर दिया हर कोई दुखी है आखिर क्यों?

एक बात अहम है कि समाज उसी को याद करता है जो इस समाज को कुछ देता है. उसी की मौत का दुख मनाता है.

जन्म तो मृत्यु के लिए ही हुआ है जो पैदा हुआ उसे मरना ही है. लेकिन मौत का समय ऐसा होता है कि मौत को बड़ा बना देता है. उस व्यक्ति की मौत पर हमें ज्यादा अफसोस होता है जो अभी भी समाज को देने के लायक बना हुआ था फिर भी उसकी मौत हो गई…

आज भी हम स्वामी विवेकानंद को याद करते हैं, क्योंकि वह कम उम्र में चले गए. लेकिन उन्होंने समाज को बहुत कुछ दिया. हमको आज भी यह अफसोस होता है कि काश स्वामी विवेकानंद और कुछ सालों तक जिन्दा होते तो पता नहीं और कितना अच्छा हो जाता. कितना कुछ समाज को देकर जाते… हमारी उम्मीद ही दुख का कारण है और यही उम्मीद हमारा उस व्यक्ति से लगाव दिखाती है कि उसके नहीं होने का हमें कितना फर्क पड़ रहा है.

किसी ने ठीक कहा कि “जिंदगी नहीं मौत बड़ी होनी चाहिए…” ऐसा नहीं है कि समाज को बाकी लोग कुछ देकर नहीं जाते. ऐसे कई फिल्मी सितारे समाजसेवी नेताओं ने बड़ी शोहरत देखी लेकिन मौत के समय गर्दिश में थे. किसी को उनकी मौत का अफ़सोस नहीं हुआ क्योकि समाज अब उनसे उम्मीद नहीं कर रहा था. लेकिन इरफ़ान खान और ऋषिकपूर की मौत का दुख सभी को है क्योंकि समाज आज भी इनसे उम्मीद कर रहा था.

“…वैसे तो दुनिया में सभी आते है मरने के लिए, पर असल मौत उसकी जिसका जमाना अफ़सोस करे..

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